Sunday, June 7, 2020

फिर प्रकृति मुस्कुराती है

जब सबकुछ ठहर सा जाता है,
इस धरा पर कुछ खिल जाता है।
फिर प्रकृति मुस्कुराती है,
और बचपन याद दिलाती है।

ये विलक्षण चक्र आगे चलता है,
यौवन तक पहुंचता है।
अब पेट की भूख बुलाती है,
नए शहर की बात आती है।

वह नई इमारत गढ़ता है,
कुदरत को शीर्ण करता है।
धरती माँ अब रोती है,
और चुपचाप पीड़ा सहती है।

जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।
प्रकृति कंपित होती है,
स्वरूप विस्तारित करती है।

वह स्तब्ध हो जाता है,
घर लौटना चाहता है।
माँ(प्रकृति) दण्ड देती है,
और उसका जीवन हरती है।

सबकुछ फिर ठहर सा जाता है,
धरा को सुकून मिल जाता है,
प्रकृति फिर से मुस्कुराती है,
और बचपन याद दिलाती है।

- सार्थक शर्मा

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